Thursday, 30 March 2017

श्वास को देखना
श्वास को देखना एक ऐसी विधि है जिसका प्रयोग
कहीं भी, किसी
भी समय किया जा सकता है, तब भी जब
आप के पास केवल कुछ मिनटों का समय हो। आती
जाती श्वास के साथ आपको केवल छाती या
पेट के उतार-चढ़ाव के प्रति सजग होना है। या फिर इस विधि को
आजमायें:
प्रथम चरण: भीतर जाती श्वास को देखना
अपनी आंखें बंद करें अपने श्वास पर ध्यान दें।
पहले श्वास के भीतर आने पर, जहां से यह
आपके नासापुटों में प्रवेश करता है, फिर आपके फेफड़ों तक।
दूसरा चरण: इससे आगे आने वाले अंतराल पर ध्यान
श्वास के भीतर आने के तथा बाहर जाने के
बीच एक अंतराल आता है। यह अत्यंत मूल्यवान
है। इस अंतराल को देखें।
तीसरा चरण: बाहर जाती श्वास पर ध्यान
अब प्रश्वास को देखें
चौथा चरण: इससे आगे आने वाले अंतराल पर ध्यान
प्रश्वास के अंत में दूसरा अंतराल आता है: उस अंतराल को देखें।
इन चारों चरणों को दो से तीन बार दोहरायें- श्वसन-
क्रिया के चक्र को देखते हुए, इसे किसी
भी तरह बदलने के प्रयास के बिना, बस केवल
नैसर्गिक लय के साथ।
पांचवां चरण: श्वासों में गिनती
अब गिनना प्रारंभ करें: भीतर जाती श्वास
- गिनें, एक (प्रश्वास को न गिनें) भीतर
जाती श्वास - दो; और ऐसे ही गिनते जायें
दस तक। फिर दस से एक तक गिनें। कई बार आप श्वास को
देखना भूल सकते हैं या दस से अधिक गिन सकते हैं। फिर एक
से गिनना शुरू करें।
“इन दो बातों का ध्यान रखना होगा: सजग रहना, विशेषतया श्वास
की शुरुआत व अंत के बीच के अंतराल के
प्रति। उस अंतराल का अनुभव हैं आप, आपका अंतरतम केंद्र,
आपका अंतस। और दूसरी बात: गिनते जायें परंतु दस
से अधिक नहीं; फिर एक पर लौट आयें; और केवल
भीतर जाती श्वास को ही
गिनें।
इनसे सजगता बढ़ने में सहायता मिलती है। आपको
सजग रहना होगा नहीं तो आप बाहर
जाती श्वास को गिनने लगेंगे या फिर दस से ऊपर निकल
जायेंगे।
यदि आपको यह ध्यान विधि पसंद आती है तो इसे
जारी रखें। यह बहुमूल्य है।”

ओशो♣♣♣♣

Wednesday, 29 March 2017

_*जागरण*_



एक खजाने हो तुम, जिसकी चाबी खो गई है। या कि एक बीज हो जिसे अपनी भूमि नहीं मिल पाई है। एक ऐसे सम्राट हो, जिसने अपने को भिखारी समझ रखा है।



और गहरी नींद है। और उस नींद में तुम स्वयं जाग सकोगे इसकी संभावना नहीं है। तुम चाहो भी, कि तुम अपने ही हाथ से जग जाओ, तो भी यह घट न सकेगा। घट इसलिए न सकेगा, कि जो सोया है स्वयं, वह स्वयं को कैसे जगाएगा? जगाने के लिए जागा होना जरूरी है।



और तुम अगर अपने अस्मिता और अहंकार से भरे हुए सोचते रहे कि क्यों किसी से कहें, कि जगाओ। अपने को ही जगा लेंगे; तो ज्यादा से ज्यादा इसी बात की संभावना है, कि तुम एक सपना देखो, जिसमें कि तुम मान लो, कि तुम जाग गए हो। सोया हुआ आदमी जागने का सपना देख सकता है; जाग नहीं सकता; सोए हुए आदमी की ज्यादा से ज्यादा संभावना यही है कि वह सपने में देख ले, कि जाग गया है। नींद को तोड़ने के लिए बाहर से कोई—तुमसे बाहर से कोई चाहिए जो तुम्हें चौंका दे।



गुरु का कोई और अर्थ नहीं है; गुरु का इतना ही अर्थ है, कि जो जागा हुआ है और जो तुम्हारी नींद को तोड़ सकता है। कुछ और करना भी नहीं है। कुछ पाना नहीं है, क्योंकि जो भी पाने योग्य है, वह तुम अपने साथ ही लेकर आए हो। कुछ खोना भी नहीं है सिवाय निद्रा के; सिवाय मूर्च्छा के; सिवाय एक बेहोशी के।



इसलिए गुरु तुम्हें आचरण नहीं देता और जो गुरु तुम्हें आचरण दे, समझना कि वह गुरु नहीं है। गुरु तुम्हें सिर्फ जागरण देता है। और जागरण के पीछे चला आता है आचरण अपने आप। वह जागे हुए आदमी की जीवन—प्रक्रिया है आचरण। और सोया हुआ आदमी लाख उपाय करे आचरण को साधने के, साध भी ले, तो भी सब सपना ही है। सब पानी पर उठा हुआ बबूला है। उसकी कोई सार्थकता नहीं है।



तुम सपने में साधु भी हो जाओ तो क्या फर्क पड़ता है? तुम सपने में चोर थे, तुम सपने में साधु हो गए; पर दोनों ही सपने हैं। जागकर तुम पाओगे, न तो सपने का चोर सच था, न सपने का साधु सच था।



इसलिए असली सवाल चोर से साधु होने का नहीं है; न बेईमान से ईमानदार होने का है; न बुरे से भला होने का है; न पापी से पुण्यात्मा होने का है; असली सवाल जागे हुए होने का है। सोए से जागे हुए होने का है।


पिव पिव लागी प्यास


ओशो

Saturday, 25 March 2017

ज्ञान का बोझ*



अकसर ऐसा मैंने देखा है कि पापी उससे करीब और पुण्यात्मा उससे दूर; और अज्ञानी उसके करीब, और ज्ञानी उससे दूर; और भोगी उसके करीब, और त्यागी उससे दूर। ऐसा मेरा हजारों व्यक्तियों के जीवन में देखने का परिणाम है, निष्कर्ष है। क्योंकि अज्ञानी को तो अकड़ नहीं होती। अज्ञानी तो कहता है: "मैं अज्ञानी, मैं कहां जान सकूंगा? मैं कैसे जान सकूंगा? बड़े बड़े ज्ञानी पड़े हैं, वे नहीं जान पाते, मेरी क्या बिसात! बस इसी में उसकी बिसात है। इसी में उसका बल है। पापी तो रोता है। उसके पास तो आंसुओं के अतिरिक्त और कोई संपदा नहीं है। प्रार्थना कर सकता है, लेकिन पुण्य का कोई दावा नहीं है।'




और प्रार्थना रुदन के अतिरिक्त और है क्या? प्रार्थना व्यवस्थित ढंग से रोना ही तो है। अज्ञात के चरणों में अपने आंसू गिराना ही तो है! लेकिन दावा नहीं हो सकता।




इसलिए अकसर पापी उसके करीब होता है, पुण्यात्मा से। पुण्यात्मा दावेदार होता है--इतना मैंने किया है! उसके खाते-बही में हिसाब-किताब है। उसके पास गणित है। झुकने की उसकी तैयारी नहीं है। हकदार की तरह मांग करने आया है।



इसलिए जीसस ने ठीक ही कहा है: जो अंतिम हैं वे प्रथम हो जाएंगे और जो प्रथम हैं वे अंतिम रह जाएंगे!



बेबूझ-सा लगनेवाला यह वचन बड़ा अर्थपूर्ण है। पापी उसके करीब हो जाते हैं, पुण्यात्मा उससे दूर हो जाते हैं।



और ध्यान रखना, मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि तुम पाप करो। मैं तुमसे कह रहा हूं: पुण्य करो, लेकिन पुण्य का दावा न हो। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि अज्ञानी रहो। मैं तुमसे कह रहा हूं: जानो, लेकिन जानने को दावा मत बनने दो। जानना तुम्हारे निर्दोषपन को विकृत न कर पाए। ज्ञान तुम्हारी छाती पर बोझ की तरह होकर न बैठ जाए। ज्ञान तुम्हें अकड़ाए न।


ज्योति से ज्योति जले
hii osho gyan sagar me aapka bohut bohut swagat hai..hamara uddesh osho ki baaton ko jan jan tak pohunchana hai..plz is page par visit karen or apne dosto ke sath bhi share karen..dhanywad